रांची: परिवार से बगावत कर सीता सोरेन ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा लेकिन अब घर वापसी की तैयारी है.सीता सोरेन दुमका में होने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के स्थापना दिवस समारोह में घर वापसी करेंगी.उनके हाव-भाव से यह पता चल रहा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा में आने के लिए उन्होंने मन बना लिया है.सीता सोरेन वैसे तो यह कह रही हैं कि अभी जहां हैं वही हैं.लोगों को अपने स्तर से अनुमान लगाने दीजिए.समय आने पर सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा.भविष्य को किसने देखा है.
दरअसल भारतीय जनता पार्टी में आकर सीता सोरेन को कुछ नहीं मिला.भाजपा ने पूरा का पूरा देने का प्रयास किया लेकिन इसका लाभ सीता सोरेन को नहीं मिला.राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि बेटियों की सलाह पर सीता सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले राजनीति बढ़ाने की कोशिश की.लेकिन यह प्रयोग कोई अच्छा रिजल्ट नहीं दे पाया.
पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पूर्व सीता सोरेन ने चुपचाप भाजपा का दामन थाम लिया था.सुनील सोरेन का टिकट काटकर सीता सोरेन को वहां से लोकसभा का प्रत्याशी बनाया गया लेकिन वह चुनाव हार गई. सीता सोरेन को फिर भी उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव में झारखंड में भाजपा की सरकार बनेगी तो मान सम्मान और बड़ा पद मिलेगा.लेकिन भाजपा को यहां भी हार सामना करना पड़ा.जामताड़ा से वह चुनाव हार गईं.सीता सोरेन को अब लग गया है कि भाजपा में आने का निर्णय आज की तारीख में गलत है.वैसे जब उन्होंने भाजपा का दामन थामा था तो सोरेन परिवार के मुखिया और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को क्या कुछ नहीं कहा था.रोना-धोना भी किया था लेकिन यह उस समय की बात थी.अब सीता सोरेन अपने बच्चों के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा में वापसी की तैयारी कर रही है.वैसे झारखंड मुक्ति मोर्चा के लोग फिलहाल उनकी घर वापसी की पुष्टि नहीं कर रहे हैं.परंतु वातावरण वैसा ही लग रह रहा है.
भाजपा के नेता फिलहाल सीता सोरेन मामले पर कुछ भी मुह खोलने को तैयार नहीं है लेकिन यह आरंभ से माना जा रहा था कि सीता सोरेन ज्यादा दिनों तक झारखंड मुक्ति मोर्चा में नहीं रहेगी.कुछ ऐसा भी हुआ कि ना तो वह सांसद बन सकीं और ना ही विधायक.सीता सोरेन को इस बात का भी दुख है कि उनकी बेटी को विधानसभा चुनाव में भाजपा ने टिकट नहीं दिया.जबकि चंपाई सोरेन और उनके बेटे को टिकट दिया गया.इस बात से सीता सोरेन चल रही थी.राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे कई नेता झारखंड मुक्ति मोर्चा को छोड़कर भाजपा में आए लेकिन अधिकांश वापस चले गए. भाजपा में उनका कोई विकास नहीं हो पाया एक बड़ा उदाहरण हेमलाल मुर्मू भी हैं. कुछ और नेता भी आए थे चले गए.
वैसे आप यह कह सकते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा भी झारखंड मुक्ति मोर्चा से ही भाजपा में आए थे लेकिन वह यहां के होकर रह गए. अर्जुन मुंडा वहां बहुत दिनों तक नहीं रहे थे.उनके भाजपा में आने का मुहूर्त अच्छा रहा और वह राज्य की सत्ता के शिखर तक पहुंचे.आज भी झारखंड भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हैं.












