रांची: दिन ब दिन शिक्षा के क्षेत्र में नाम ऊंचा करने वाला सरला बिरला विश्वविद्यालय किसी परिचय का मोहताज़ नहीं। यहां एक से एक कार्यक्रम आयोजित होते हैं।सरला बिरला विश्वविद्यालय में बसंत कुमार बिरला स्मृति व्याख्यान के अंतर्गत ‘जलवायु परिवर्तन : पृथ्वी एवं मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव – कार्रवाई का समय’ विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रख्यात बाल एवं श्वसन रोग विशेषज्ञ तथा पर्यावरणविद् प्रो. (डॉ.) एच. परमेश ने ऑनलाइन माध्यम से अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। वे भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के डिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।
अपने व्याख्यान में प्रो. परमेश ने कहा कि मानव जीवन और दीर्घकालिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध पृथ्वी के जैविक एवं अजैविक तंत्रों के संतुलन से है। उन्होंने बताया कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है। उन्होंने कार्बन डाइऑक्साइड के बढ़ते उत्सर्जन, पृथ्वी की उसे अवशोषित करने की सीमित क्षमता तथा इसके दूरगामी परिणामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो जलवायु परिवर्तन के परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की आवश्यकता पर भी उन्होंने विशेष बल दिया।
मानव स्वास्थ्य पर प्रदूषण के प्रभावों की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि वायु प्रदूषण केवल श्वसन तंत्र को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर शरीर के लगभग सभी प्रमुख अंगों पर पड़ता है। उन्होंने घरों के भीतर एवं बाहर होने वाले वायु प्रदूषण के स्रोतों तथा प्रदूषण के सूक्ष्म कणों के आकार के आधार पर उनके फेफड़ों और श्वसन मार्ग में प्रवेश करने की प्रक्रिया को समझाया। अपने शोध के उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि अधिक यातायात वाले क्षेत्रों के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों में अस्थमा की समस्या अधिक देखी गई है। इसी प्रकार यातायात पुलिसकर्मियों में भी अन्य लोगों की तुलना में अस्थमा का खतरा अधिक पाया गया है।
उन्होंने कहा कि बढ़ता तापमान और ओजोन का स्तर भी अस्थमा के मामलों को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वायु प्रदूषण के कारण समय से पहले जन्म, मृत शिशु का जन्म, हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह, कैंसर, किडनी एवं लिवर संबंधी बीमारियों के साथ-साथ तंत्रिका तंत्र से जुड़ी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ता है। उन्होंने डिमेंशिया एवं ऑटिज्म जैसी स्थितियों के संदर्भ में भी पर्यावरणीय कारकों पर चर्चा की। इसके अतिरिक्त उन्होंने विद्यार्थियों के भारी स्कूल बैग, ध्वनि प्रदूषण तथा कृत्रिम प्रकाश से होने वाले दुष्प्रभावों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया।
भारत में औसत जीवन प्रत्याशा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि देश में यह लगभग 72.72 वर्ष है, जबकि झारखंड में यह 69.5 वर्ष के आसपास है। उन्होंने विभिन्न देशों के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की तुलना करते हुए बताया कि अमेरिका में यह लगभग 16 टन, जबकि भारत में लगभग 1.05 टन है। उन्होंने आम नागरिकों से सार्वजनिक परिवहन के उपयोग, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने तथा अनावश्यक हवाई यात्राओं में कमी लाने जैसे उपाय अपनाने की अपील की।
समाधान के उपायों पर प्रकाश डालते हुए प्रो. परमेश ने प्रदूषण के स्रोतों पर ही नियंत्रण करने, अधिकाधिक वृक्षारोपण एवं हरित क्षेत्रों का विस्तार करने, संवेदनशील आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी एवं सामाजिक स्तर पर सक्रिय पहल करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, वर्ष 2070 तक भारत के नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य तथा मेक्सिको सिटी में वायु गुणवत्ता सुधार के लिए किए गए प्रयासों का भी उल्लेख किया।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जनस्वास्थ्य एवं पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सामूहिक प्रयासों से लेड युक्त पेट्रोल पर प्रतिबंध, तंबाकू के धुएं पर नियंत्रण, लाउडस्पीकर एवं पटाखों के शोर को सीमित करने तथा विद्यार्थियों के स्कूल बैग के वजन पर नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण कदम संभव हो सके हैं।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के महानिदेशक प्रो. गोपाल पाठक, कुलपति प्रो. सी. जगनाथन, विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के डीन, विभागाध्यक्ष, प्राध्यापक, कर्मचारी एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे।
एसबीयू के माननीय प्रतिकुलाधिपति बिजय कुमार दलान एवं माननीय राज्यसभा सांसद सह निदेशक प्लानिंग एंड डेवलपमेंट डॉ प्रदीप कुमार वर्मा ने व्याख्यान के आयोजन पर हर्ष व्यक्त किया है।

