
26 दिनों तक चले आमरण अनशन के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना उपवास समाप्त कर दिया। उन्होंने बताया कि यह फैसला सरकार से महत्वपूर्ण बिंदुओं पर लिखित आश्वासन मिलने के बाद लिया गया। वांगचुक के अनुसार, केवल मौखिक भरोसे के बजाय लिखित सहमति उनके लिए सबसे जरूरी शर्त थी, इसलिए बातचीत पूरी होने तक उन्होंने अनशन जारी रखा।

वांगचुक ने कहा कि सरकार ने आश्वासन दिया है कि आंदोलन के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले लोगों पर नए मुकदमे दर्ज नहीं किए जाएंगे। साथ ही, परीक्षा विवाद से प्रभावित परिवारों के लिए राहत और सहायता जैसे मुद्दों पर भी सकारात्मक रुख अपनाया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि संसद में परीक्षा प्रणाली में सुधार और पेपर लीक जैसे मामलों पर व्यापक चर्चा कराने का भरोसा दिया गया है। सबसे ज्यादा चर्चा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हुई। इस पर सोनम वांगचुक ने स्पष्ट किया कि सरकार ने इस विषय पर कोई तय समयसीमा या ठोस आश्वासन नहीं दिया है। हालांकि, उनका कहना था कि फिलहाल उनका मुख्य उद्देश्य छात्रों और युवाओं के हितों की रक्षा करना था, न कि केवल किसी एक व्यक्ति के इस्तीफे पर आंदोलन को केंद्रित रखना। उन्होंने कहा कि यदि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर तुरंत फैसला नहीं होता, तो इससे आंदोलन की मूल भावना कमजोर नहीं होगी। उनके अनुसार, किसी भी युवा के भविष्य पर पुलिस कार्रवाई या कानूनी मामलों का असर पड़ना सबसे बड़ी चिंता थी। इसी वजह से प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने का आश्वासन उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि रहा। सोनम वांगचुक ने देशभर से मिले समर्थन के लिए नागरिकों, छात्रों और जनप्रतिनिधियों का आभार जताया। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष केवल एक मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और युवाओं के भविष्य को सुरक्षित बनाने की दिशा में एक लंबी पहल है। उन्होंने समर्थकों से आगे भी शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाने की अपील की।

